Saturday, 10 September 2022

How to book train ticket with mobile I मोबाइल से ट्रेन टिकट कैसे बुक करें । Mobile se train ticket kaise book karen


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                         IRCTC Logo










यात्रीगण ध्यान दें अब आप अपना ट्रेन टिकट , एक्सप्रेस ट्रेन हो या पैसेंजर ट्रेन , सभी का टिकट आप मोबाइल से बुक कर सकेंगें । रेलवे इसे अपना IRCTC  वेबसाइट के द्वारा संचालित करती है ।

आप मोबाइल से ट्रेन टिकट बहुत आसानी से बुक कर सकते हैं ।

Train ticket book karne ke liye jaruri chijen

ट्रैन टिकट बुक करने के लिए आपको :
एक स्मार्ट फ़ोन होना चाहिए , जिससे एंड्राइड होने भी कहते हैं . या तो आई फोन हो .
फोन में इंटरनेट होना आवश्यक है
एक बैंक अकाउंट जो आपके फ़ोन से जुड़ा हो .

'IRCTC' का 'USER ID' aur uska 'Password'.



Train Ticket kahan se Book kar sakte hain

ट्रेन टिकट आप किसी भी साइट या अप्प से बुक कर सकते हैं पर सभी साइट्स का 'IRCTC' से मान्यता' रजिस्ट्रेशन होना चाइये ।
आप ट्रेन टिकट मोबाइल से सीधा 'IRCTC' के साइट पर जाकर बुक कर सकते हैं ।
किसी 'UPI' के 'App' पर जाकर , वहां से टिकट बुक कर सकते हैं , जैसे 'PayTm', 'GPay' इत्यादि इत्यादि ।
या फिर किसी अन्य ट्रेन बुकिंग साइट पर जाकर ।



IRCTC Registration ka Tarika


ट्रेन टिकट हम कहीं से भी बुक करें , किसी भी साइट पर जाकर बुक करें लेकिन सबसे पहले हमें अपना 'IRCTC' साइट पर जाकर रजिस्ट्रेशन करना पड़ेगा और फिर अपना 'User ID' और एक 'Password' बनाना होगा ।
सबसे पहले आपको 'IRCTC' के साइट पर जाना होगा , जिसका पता है www.irctc.co.in .

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यहां 'From' में जिस स्टेशन से यात्रा शुरू करना है उसका नाम भरें ।
'To' में जिस स्टेशन पर पहुंचना है उसका नाम भरें ।


तारीख वाले जगह पर कैलेंडर खोल अपने जाने का तारीख भरें ।

'Al Classes' को क्लिक कर अपना क्लास अर्थार्त किस जनरल , ऐरकण्डीशन , इत्यादि वाला क्लास चुनें .

फिर 'General' पर क्लिक कर अपना विकल्प चुनें ।

अब निचे 'Search' पर क्लीक करें ।
'Search' पर क्लीक करते ही एक नया बॉक्स खुलेगा
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यहाँ पर आपको विभिन्न ट्रेनों का विवरण दिया होगा और उनके बर्थ का स्तिथि । यहाँ से आप आगे की विवरण डाल अपना ट्रैन और क्लास बुक कर सकेंगें .
अपना 'Class' चुनते ही 'Book Now' वाला बटन उभर जायेगा जिससे क्लीक करते ही 'I Agree' 'I don't Agree' वाला बॉक्स खुलेगा जिसे क्लिक करने पर 'LOGIN' वाला बॉक्स खुलेगा ।
यहाँ पर आपसे 'User Name' और "passsword' पूछा जायेगा । चूँकि ये दोनों आपको तभी मिलते हैं जब तक आप अपने को "IRCTC" पर रजिस्टर नहीं कराया हो ।
इसके लिए 'LOGIN' बॉक्स के एकदम निचे जाकर 'REGISTER' वाले विकल्प को चुनें .
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'REGISTER' पर क्लीक करते ही 'Create Your Account' वाला बॉक्स खुलेगा ।

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इस बॉक्स में अपना सब विवरण भरें जैसे जैसे माँगा गया है ।
पहले आपको एक 'User name' चुन कर भरना होगा ।फिर एक 'Password' भरें इत्यादि ।इसके बाद आप व्यक्तिगत विवरण भरना है ।और फिर अंत में अपना पता का विवरण ।सब होजाने के बाद निचे दिया हुआ 'Register' पर क्लिक कर अपना पूरा रजिस्ट्रेशन पूरा करें ।
इस बॉक्स को भरने के लिए आपको एक सही 'e-mail' और मोबाइल नंबर होना चाहिए ।


एक दूसरा तरीका 'Register' करने का
निचे वाला तरीका पुराण हो चूका है और इससे अच्छा और सीधा ऊपर में दिया हुआ ही सीधा सपाट तरीका है ।

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तीसरा , अब आपको 'Login' विकल्पमे जाकर 'Signup' पर क्लिक करें ।
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चौथा , 'Signup' करने से हम 'IRCTC' रजिस्ट्रेशन फॉर्म पर चले जायेंगें ।
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पांचवां , ऊपर दिखाए हुए 'User Name' में अपना 'user name' बनायें , जो 3 से 35 अक्छर से ज्यादा नहीं हो .
छटे , 'Security Question' और उसका 'Answer' को चुनें ।

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सातवां , अपना नाम , लिंग , व्यवहाहीक, पेशा , तथा जन्म तिथि को भरें ।
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आठवां ,'E-mail' , अपना 'Mobile नंबर और अन्य सभी भरें ।
नौवां , अपना सभी पता पूर्ण रूप से भरें , पिन कोड सहित ।
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दसवां , अब आप नीचे में दिए हुए खाली जगह में ऊपर के अक्षरों को भरें और फिर 'Submit' बटन पर क्लिक करें ।
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ग्यारवां , अब सभी विवरण सुनिश्चित करने के लिए आपपर भेजा हुआ 'OTP' को 'e-mail' और मोबाइल नंबर के खानो में भरें । फिर 'Submit' पर क्लिक करें ।

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Mobile se train ticket book karne ka tarika

1.IRCTC  का साइट' 'www.irctc.co.in' को खोलें और सीधा वहीँ से बुक करें , जैसे निचे दिखाया गया है :
ये भी थी ऊपर में दिया हुआ तरीका ही है यहाँ कंप्यूटर या लैपटॉप की जगह आप मोबाइल का इस्तेमाल करें ।
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  1. 'From' में प्रस्थान का जगह लिखें .
  2. 'To' में पहुँचने वाला जगह भरें.
  3. अब पूरा तारीख लिखें .
  4. 'क्लास' में अपना बैठने का शयनयान भरें .
  5. फिर इसके निचे 'जनरल 'तत्काल' या 'लेडीज' वाले विकल्प चुनें .
  6. अब 'सर्च' पर क्लिक करें और विभिन्न ट्रेनों में से अपना ट्रैन को चुनें.
  7. अब आपको अपना 'यूजरId' और 'पासवर्ड' भरक लॉगिन'करें .
  8. फिर निचे में दिए हुए 'कैप्चा' को भरें सही से .
  9. अब 'साइन इन् 'पर क्लिक करें .
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इसके बाद पैसेंजर का डिटेल्स भरें ।नाम उम्र lingकिन्ही को जोड़ना हो तो +Add डिटेल्स में ।मोबाइल नंबर पहुँचने का पता पिन कोड सहित
अगर हमर कोई चॉइस है कोच और सीट में ।इन्शुरन्स लेना है या नहीं



Payment Mode

यहाँ से आपको भुगतान का तरीका अपनाना है ।
इसके लिए हमें अपने मोबाइल नंबर को किसी एक बैंक अकाउंट से जोड़ना होगा ।
सही भुगतान हो जाने के बाद टिकट बुक हो जाता है जिसका सन्देश हमें सभी विवरण के साथ अपने मोबाइल पर मिल जाता है ।



IRCTC App se Train ticket booking

'App' को सबसे पहले मोबाइल में डाउनलोड करें प्लेस्टोरे पर जाकर ।
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IRCTC App








फिर जैसे जैसे उसमे विवरण मांगे गए भरने के लिए हमें भरते जाना है और ठीक ऊपर दिया हुआ रेलवे के साइट की तरह ही सब आगे का काम करते जाना है।
किस साइट से बुक करें ये आप पर निर्भर करता है की कौन से तरीके आपके लिए सुविधाजनक है ।

पड़ने के लिए बहुत धन्यवाद्

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और पड़ने के लिए निचे लिंक पर क्लिक करें :


Corrrupt Traffic Police system l ट्रैफिक एक सरकारी वसूली उद्योग







 भाई ट्रैफिक पुलिस वाले तो गजब मनमानी करते हैं।

रोकेंगें आपको, गाड़ी नम्बर का फोटो खिंचेगें पर उनसब को छोड़ आपसे बेल्ट या लाइसेंस के बारे में बात करने लगेंगें। मतलब समझें, आपके गाड़ी का नम्बर अपने मोबाइल में डाल कर सब

उनको तो बस किसी भी तरह से आपसे पैसे खींचना है।

हम तो समझते हैं कि अगर आपका गाड़ी रोकते ही आप अपने खिड़की से पैसे बढादें तो शायद निपटारा वहीं हो जाये,और सब कागज पत्र के झंझट छोड़ आगे बढ़ सकते हैं जैसे ट्रक वालों के साथ इनका डीलिंग होता है।

ट्रक वाले खिड़की से फिक्स पैसा अपने हाथ में रखते हैं जिससे पुलिस वाले को चलती गाड़ी से बाहर कर दे चलते बनते हैं।

एक बार एक पुलिस वाला मेरी प्राइवेट गाड़ी चेक करते करते अंत में मुझसे निजी वाहन का फिटनेस सर्टिफिकेट मांगने लगा था। इनको तो बस किसी भी तरह पैसा चाहिए, भाई सभी जगह पहुंचाना जो होता है।

ट्रैफिक एक वसूली उद्योग

ट्रैफिक व्यवस्था एक वसूली उद्योग है जिसमे सरकार और पुलिस मिल कर चलाते हैं, मतलब सब के लिए ये उद्योग खुला या उपलब्ध नही है सिर्फ और  सिर्फ  सरकारी लोग ही इसे चला सकते हैं। इससे बढ़िया और कोई उद्योग ही नही है, इसमें कोई इन्वेस्टमेंट नही है सिर्फ कमाई ही कमाई है। कोई रिस्क नही सिर्फ जनता को मिल्क करना है।

ये करोड़ों का व्यवसाय है और पूरा विभाग इससे मालामाल होते हैं।

भाई अंधेर नगरी चौपट राजा वाला खिस्सा है यहाँ, शायद यहीं नही सारे सरकारी व्यववस्था में ही क्योंकि इन कठपुतलियों का डोर तो इनके आका के हाथ में होती है जो अपने अपने ऑफिसों से चलाते रहते हैं।

इन सब का मनसा सिर्फ एक होता है पब्लिक को दुहना। आम जनता को लूटना और अपना अपना जेब नही परंतु घर नोटों से बढ़ना।

जानते हैं, ये राह चलते लोगों को परेशान करते हैं। क्या रिक्शा वाला क्या चार पहिया वाला।

ये लीचर लोग रिक्शा वाले या रिक्शा पर चलने वाले लोगों को भी नहीं बख्शते हैं। अगर आप रिक्शा से भी जा रहे हैं तो कुछ न कुछ बहाना लगाकर पैसे खिंचने का कोशिश करते हैं। जैसे अगर रिक्शा से कुछ सामान ले जा रहे हैं तो तब भी ये लोग आपको रुकवा का परेशान करेंगें, पूछेंगे की आप सामान को रिक्शा से क्यों ले जा रहे हैं। और दो पहिया और चार पहिया का कहानी त अनेखः है। 

सोचिए ये सब घनी आबादी में होता है जहां ट्रैफिक 10 या 20 किलोमीटर प्रति घण्टा चलता है, कभी इतना कम स्पीड में एक्सीडेंट हो सकता है क्या। गाड़ियां तो हाई स्पीड में हाईवे पर चलती है जहां रोड पर कोई ट्रैफिक नही होता है। यहां दो पहिये भी 70/80 किलोमीटर प्रति घण्टे के हिसाब से भागती है। दुर्घटनाएं यहां होती हैं, रोज गाड़ी वाले या आम पब्लिक ऐसे धक्कों से मेरी जाती है, पर इन सड़कों और पुलिस बहाल नही होगी क्योंकि यहां गाड़ियों को रोकना और कमाना मुश्किल है।

भाई इस धन्दे में सब लिप्त हैं खुलम खुल्ला वसूली होता है सब जानते हैं मगर न जनता आवाज़ उठाती है न ये भर्ष्ट और बेशर्म सरकार और उनके वसूली एजेंट विभाग वाले वर्दी वाले।

भाई ये खिस्सा तो सरकार के हर विभाग में है, सब मोटे मोटे वेतन लेते हैं और उससे भी मोटे पब्लिक से घुस और विकास के फण्ड पर पूरा हाथ साफ किया जाता है।

जान लीजिए जहां जितना बेकारी और पिछड़ापन है वहाँ उतना ही भरस्टाचार है।

ट्रैफिक पुलिस कैसे मैनेज होते हैं

लोगों को देखकर या उनका अनुभ लेकर आप ट्रैफिक पुलिस मैनेज होते हैं।

जैसे ट्रक वालों से सीखें, हाथ में पैसा रखते हैं और खड़ा सिपाही को दे चलते बनते हैं।

मैनेज करने वाले को अगर किसी ने रोका तो घबराते नहीं, कुछ गिड़गिड़ा कर या कुछ रिक्वेस्ट कर अमाउंट पैसे का सेटल कर लेते हैं।

ये अगर नहीं माने तो थोड़ा इंतेज़ार करते हैं और थोड़ा खींचते हैं उनको।

हाँ अपने सौदेबाज़ी में ईमानदारी रखते हैं या ऐसा शो करते हैं कि आप सही हैं अपने बातों में।

आप थोड़ा जेनुइन रहेंगें अपने वेशभुसा में तो थोड़ा राहत मिल सकती है उनके बोली और डिमांड में, आखिर पहला इम्प्रैशन बड़ा इम्प्रैशन होता है।

और सबसे बढ़िया तो होगा कि आप अपना सभी कागज़ ही सही रख्हें और गलत पर उन पर चढ़ जाएं।

Friday, 26 August 2022

अटेंडेंट की एक प्राइवेट अस्पताल में अनुभव । Selfie of an attendant in private hospitals l

ऊपर शिर्स्क वाले सेल्फी जो लिखा है उससे मेरा मतलब मोबाइल वाला सेल्फी नहीं पर ये सेल्फी फोटो से नहीं है पर ब्लॉग से अपना सेल्फी वर्णन है।
आज मैं Appolo Big Spectra अस्पताल में हूँ। पत्नी को डेंगू होगया है इसीलिए घर पर दिक्कत बढ़ जाने के कारण हमने सोचा कि अब अस्पताल में भर्ती कर दिया जाए। बगल यही अस्पताल था और मेरे सुभाव से मिलता हुआ यह अस्पताल था तो मैंने इसमें एडमिट कर दिया। पर कुछ देर बाद ही मुझे कॉल आया कि उपड आकर जानकारी दें। उपर आया तो देखा कि पत्नी के आंखों से धारा प्रवाह आंसू बह रहा है, मेरे पूछने पर कुछ बोल नही रही थी और और ज्यादा रोने लगती। बड़ा विकट स्तिथि था, अस्पताल वाले को पूछा तो वो भी कुछ नही बताया बस बोला कि शायद हड़बड़ा गयी है। मेरे कुछ जवाब देने पर ही बताई की ये सब देख कर डर लग रहा है। HDU मे भर्ती थी और चारों तरफ किस्म किस्म के मरीज पड़े हुए थे बड़ा भयावह दृश्य था, भाई मैं तो खुद ही डर गया था। याद आ गया मेरे बड़े भाई का अस्पताल का दृश्य।अस्पताल में जब भी कोई आता है और अगर उसका कंडीशन सीरियस हो और उस पर भर्ती होने पड़े तो सच में बड़ा डर लगने लगता है मरीज को और अटेंडेंट दोनों को, क्योंकि आजकल प्राइवेट अस्पताल बड़े बड़े बिल्डिंग तो हैं पर उनका सर्विस उतना बड़ा नहीं है। और अस्पतालों में, या ऐसे भी अन्य डॉक्टरों के यहां भी मरीज मरीज नहीं होता है पर एक ग्राहक के रूप में उसको देखा जाता है। मरीज को आजकल कस्टमर बोला जाता है जब अस्पताल वाले अपने सप्लायर से बातें करते हैं तब। मेन रोड पर इतने अस्पताल खुल गए हैं कि क्या करें बेचारे अस्पताल वाले।इसके बाद हर गली हर मुहल्ला में अस्पताल खुल गया है। आधे अस्पताल तो सामान्य लोग या व्यापारी खोल रहे हैं जिनका काम सिर्फ धनदा करना है मरीज का इलाज नहीं। तो प्रतिस्पर्धा इतना हो गया है और इन अस्पतालों पर इतना खर्चा है कि क्या करे बेचारा, एक एक मरीज के लिए तरसते हैं ये लोग। अगर एक मरीज चला गया हो इनके पास तो बस इन अस्पतालों के स्टाफ लग जाते हैं मरीज को फंसाने और फिर दुहने में। बेचारा मरीज और उसके परिजन परेशान रहते हैं इलाज करवाने में पर पहले तो अस्पताल के स्टाफ ही इनको अगर डॉक्टर न हो तो उलझने में लग जाते हैं और इलाज शुरू हुआ तो बेचारे मरीज को तरह तरह का चेकउप करवाना पड़ता है। पेट में दर्द हो तो CT स्कैन कार्रवाईएंगें सिर का। दवा में भी उसी तरह का मारा मारी करते हैं ये लोग। भर्ती हुए तो आसमान ही गिर पड़ता है बेचारे मरीज के परिवार को तो तबाह कर दिया जाता है।
मरीज का वर्ग अगर देखिएगा तो ये मध्यम वर्ग के ही होते हैं। इस वर्ग में निम्न मध्यम वर्ग, मध्यम मध्यम वर्ग, और उच्च मध्यम के ही होते हैं। निम्न वर्ग मतलब लोअर क्लास वाले तो कम से कम इतने बड़े अस्पताल में नहीं दिख रहे हैं, शायद इनके पास इतना होता ही नही है कि बेचारे प्राइवेट अस्पताल में आने का हिम्मत कर सके। इसी तरह अपर क्लास वाले पता नही पूरे तंदुरस्त रहते हैं क्या की वो दिख ही नही रहे हैं, हाँ एक्के दुक्के लड़कियां हाई फैशन लिबास और मेकअप में भले दिख जायें--नहीं ऐसा बात नहीं कुछ तो आते ही हैं शायद स्पेशल डॉक्टर को दिखाने आखिर बीमार तो कोई भी हो सकता है आप कितने भी फिट रहें एक्सीडेंट, मच्छर(डेंगू),और कैंसर जैसे परेशनयों तो किसी को भी अपने आगोश में ले सकती हैं। तो इन अस्पतालों में सिर्फ और सिर्फ मध्यम वर्ग, और ये प्राइवेट अस्पताल चलती भी हैं तो सिर्फ मध्यम वर्ग के मरीज पर, ये मध्यम वर्ग जो सरकारी अस्पताल जाते नहीं हैं और बहुत बड़े अस्पतालों या बड़े शहरों में औकात नही है जाने की।
अपने बारे में बताऊं। तो हमने घर पर निर्णय लिया की सुधार करने के लिए सिर्फ एक दिन अस्पताल में रह जाय, क्योंकि अगला दिन बच्चों को पढ़ाई के लिए दिल्ली जाना था और टिकट कटा हुआ था।अस्पताल में भर्ती होने का हिम्मत भी इसीलिए हुआ की हमारे दोस्त ने हमारा एक हेल्त इन्शुरन्स कर दिया था जबरदस्ती और हम भी बहुत लेहाजी दे दिए पैसा, अच्छा खासा अमाउंट था हमारे लिए भाई, अपनी ताकत से ज्यादा का, हमारी कमजोरी है हम नजदीकियों और इज़्ज़त देने वालों के सामने झुक जाते हैं और इसी प्रकरण में हमने ये अमाउंट अपने होम लोन एकाउंट से दे दिया इसमें हमारे इन्शुरन्स वाले दोस्त ने भी सहयोग किया था कुछ उधार हमारे तरफ से देकर। तो ये हेल्थ इन्शुरन्स अब काम आया और हमारा हिम्मत बढ़ाया गया। डॉक्टर भी खुश थे कि मरीज अपने तरफ से भर्ती हो रही हैं सो उन्होंने उसे HDU में भर्ती कर दिया। अब थोड़े देर बाद हमे फ़ोन आया कि अर्जेंटली मरीज को अटेंड करें। कमरे में गया तो वो एक कॉमन हॉल पाया जहां और भी मरीज थे विभिन्न स्थितियों में और पत्नी रो रही थी।हम हतप्रभ ये क्या हुआ इतना स्ट्रांग और दुनिया को सहारा देने वाली खुद रो रही थी, हमारे पूछने पर भी कुछ नही बोल रही थी, हमने वार्ड अटेंडेंट को पूछा तो वो भी कुछ नही बताने में असमर्थ था, बड़ा समस्या। हम तो घबरा गए,पत्नी को पूछा कि कोई कुछ किया क्या तो उसने न में बताया तत्काल शांति मिली फिर पूछा तो क्या हुआ तो बताई ये दिन और ऐसा दृश्य का हमने नहीं सोचा था। सच बात तो यही था कि हम सब तो एक प्राइवेट रूम का सोचा था और ये कहाँ आ गए। फिर क्या करते , हमने इमरजेंसी,जहां से रेफेर किया गया था वहां पूछा तो उन्होंने ने कुछ कुछ हमे समझा दिया। लौटकर हम अपने बेटी और पत्नी की भतीजी के साथ हर कर अस्पताल के कैंटीन में बैठ गए कुछ खाने के लिए क्योंकि सुबह से हमने कुछ खाया नहीं था। अपना खाना थाली वाला लिया और टेबल पर बैठ गया फिर हमने अपने बेटी को बताया कि भाई को भी बुला ले खाने के लिए जिसे मैंने कुछ समय पहले डांट कर भगा दिया था। बहन के फ़ोन पर तुरंत आ गया और तब तक मैं कह चुका था।अब चर्चा हुई इनके माँ के बारे में और मैंने बताया की ये ज्यादा पैसे लेने के लिए दूसरे जगह रख दिये हैं। इस पर लड़की बोली कि हम बोलें जा कर क्या तो मैंने बोल दिया ठीक है और सब काउंटर बताया जहाँ बात करना पड़ेगा। फिर ये दोनों बच्चे, 18 और 20 साल के हैं, दौर धूप कर रूम अलॉट कर ही लिया बस हमसे इन्होंने पूछा कि कितने अमाउंट क लिया जाए तो मैंने उचित डिसिशन के लिए उन्हें बता दिया, उन्होंने ने इन्शुरन्स अमाउंट जब पूछा तब मेरे बताने पर खाफी रिलैक्स दिखे ये ।इतनी आजादी मिलते ही इनलोगों ने रूम फाइनली बुक कर दिया, और हाँ इसके पीछे मुझे अपने इन्शुरन्स वाले दोस्त से मार्गदर्शन भी मिला था क्योंकि आजतक मैं ऐसी कोई हेल्थ इन्शुरन्स का सुविधा नहीं उठाया था।
खैर बच्चे अब बहुत खुश थे अपने इच्छा हासिल करने पर। फिर इन्होंने मुझे प्राइवेट रूम में फ़ोन कर बुलाया और अंदर जाते देखा कि सभी बहुत खुश थे और तीनों गप शप में लगे हैं। 
सब कुछ ठीक था और माहौल पिकनिक का था पर कुछ देर बाद मरीज का स्थिति बिगड़ने लगा जो रात होते होते ज्यादा ही बिगड़ गया।आज पता चला कि प्लेटलेट संख्या कल से भी कम हो गया , मरीज के साथ तो अब हम भी परेशान हो गए और इसी परेशानी में स्तिथि नाज़ुक देखते हुए हमने बच्चों का दिल्ली का टिकट ही कैंसल कर दिया। तो यही हुआ पिकनिक अब परेशानी में बदल गया।
आज रविवार है, सुबह में कैम्प लगा था तो कुछ चल पहल भी था पर शाम होते ही सब बदल गया अब तो माहौल मनहूस जैसा हो गया है, एक दम शांत हो गया है पूरा फ्लोर रूम के बाहर कोई आवाज और कोई भी चहल पहल नही । ठंडा ठंडा रूम और बाहर बादल ने पूरा वातावरण बदल दिया है अब तो जो पहले वाला पिकनिक मूड था अब उलट गया है इन सबके ऊपर फलाहारी मनाने के कारण और भी पनिशिंग हो गया है।
मरीज में सुधार होने के कारण अब लौट ही चलें। बच्चों का भी टिकट तेजस से कर दिया है और भी कल शाम को निकल जाएंगे। फिर यहाँ अब कोई आएगा भी नहीं, जो नजदीकी आने वाले थे वो सुधार देख कर अपनी ये कंपल्सरी विजिट को यही बहाने टाल दिया।
आज डॉक्टर साहब ने फाइनली रेलीज़ करने को कह दिया है, अब पेपर बन रहा है, हम सब सामान पैक कर बैठे हैं रूम, जो छटे तल्ला पर है खिड़की के पर्दा उपड कर बैठे हैं। वो रूम जो पहले दिन इतना अच्छा लगा था बाद में मनहूस लगने लगा, आज भी वही हाल है, सब फैसिलिटी होने पर भी कुछ अच्छा सा नही लग रहा है, जबकि दूसरे रूम में लगता है लोग आराम से हैं और बाहर आम जगह फिर चहल पहल और लोगों के बीच ठीक से लगता है।
आज,बहुत दिनों के बाद एक दूसरे अस्पताल में बैठा हूं। ठंडी का मौसम है और इस मौसम में बीमारी काम होता है तो मरीज भी कम होते हैं, हमने यही सोच कर समझा की अस्पताल में पेशेंट कम होंगें पर आप ऊपर फोटो में जैसा देख सकते हैं की अस्पताल भरा हुआ है और इसमें मरीज की कमी नहीं है।
तब अपना अपना भाग्य है, इससे भी ज्यादा अपना अपना मेहनत और सर्विस है। इस अस्पताल के साथ उसका इस प्रांत में उसका लोकेशन भी है। ये अस्पताल ऐसा जगह पर स्थित है की यहां राज्य के आधा आबादी के रास्ते में पड़ता है।
अब रह गया मरीजों का बात तो कुछ लोग अंदर आ रहे हैं तो कुछ बाहर जा रहे हैं, अपना अपना सामान के साथ।
ज्यादातर लोग तो सामान्य से गंभीर ही है।
भाई ये अलार्म क्यों बार बार बज रहा है, अगर आग लगा तो हमारा मरीज तो चल भी नहीं सकता है इतना कमजोर है। ऐसे ही स्थिति में लाचार मरीज किसी अनहोनी दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं।
खैर मैं अस्पताल में अटेंडेंट सभी का विवरण दे रहा था, कुछ को मैंने सुसकते हुए देखा तब आगे बड़ा तो किसी के आंख लाल था। एक मेरे पीछे बैठी है शायद उमर वाली किसी को देर से मोबाइल पर समझा रही हैं।
छोटा रिसेप्शन और भीड़ ज्यादा होने के कारण आवाज कोलाहल ज्यादा है चारों तरफ।
कभी रिसेप्शन हाल में बैठ कर समय गुजारते हैं और बहुत समय हो जाता है तब सोचते हैं अब रूम में भी बैठना चाहिए तब वहां अंदर जा कर बैठते हैं।
और जब अंदर बैठे बैठे मन ऊब जाता है तब फिर बाहर निकल कर कॉरिडोर में घूमते हैं, यहां अगर कोई मोबाइल पर बात करता हो तो उसके पीछे हो कर उसकी बातें सुन टाइम गुजारते हैं। यही रूटीन होता है अस्पताल के अंदर। वैसे ज्यादा समय तो मोबाइल पर ही गुजरता है।

विजिटर्स को परेशानी बहुत है। एक दो से ज्यादा विजिटर या अटेंडेंट  नही रहने देते रूम में। आईसीयू में अगर आप जाना चाहें तो ये आप से पास मंगेगें या लिफ्ट पर ही रोक देते हैं, कुछ गार्ड तो आग्रह करेंगें पर कुछ तो सीधा ही मना कर देते हैं और आप कुछ नही कर सकते हैं, बस आपको वापस आकर अपने लिए जगह ढूंढ कर बैठ जाना होगा भरी मन से।
आप अगर कैश में इलाज करवा रहे हैं तो दवा,इलाज अन्य खर्चों से आप पस्त हो जायेंगें। इसीलिए हो सके तो किसी कंपनी से अपना स्वास्थ्य बीमा करा लें और निश्चिंत होकर अपना इलाज करवाएं।
जानलें बीमा होने पर भी ये कंपनियां कुछ पैसा काट लेते हैं, मतलब पुरा पैसा इलाज का वापस नहीं करते हैं।
अस्पताल में  भी आपको सचेत रहना होगा और उनका कागज बिल देखते रहना होगा नही तो  बिना वजह ये एक ही दावा का खर्च दोहरा देते हैं। इसी तरह ये अन्य खर्च जैसे जांच इत्यादि में भी ऐसा घोटाला होते रहता है।

अब हमे अचानक आईसीयू में आजाना पड़ा। रात में खून की उल्टियां हुईं और मरीज को जल्दी जल्दी आईसीयू में ऑक्सीजन के साथ शिफ्ट कर दिया गया।
हम सुबह पहुंचे तब मुझे आईसीयू के वेटिंग रूम में बैठना हुआ, यहां तो पहले से ही अटेंडेंट सब अपने अपने मरीज और पैसों की मार से गंभीर और गमगीन चेहरों में थे। यहां जहां जगह है बैठ जाएं कोई टोक टॉक नही सभी तो अपने ही परेशानी के बोझ तले झुके हुए हैं, सर उठता कहां है बेचारों का। जितने अटेंड्ट को देख रहा हूं सभी मध्यम वर्ग से हैं।इसका मतलब मरीज मध्यम वर्ग से ही आते हैं। बेचारे मिडिल क्लास, जीना मुश्किल है। अगर मरीज मिडिल क्लास से हैं तो मतलब ये होता है की गलती इनका ही है, ये लोग अपने खान पान और स्वास्थ पर ध्यान नहीं देते हैं।
लोअर क्लास के लोग तो ऐसे महगें प्राइवेट अस्पताल में हिम्मत नही कर सकते आने का, इन्हे तो सरकारी अस्पताल में ही जाना पड़ता है जहां उन्हें सरकार और उनके नुमाइंदों के भरोसे रहना पड़ता है, वही सरकार जो इन्हें 90 पर्सेंट हिस्सेदारी का वायदे देकर इन लोगों को अस्पताल के फर्श पर छोड़ देते हैं सड़ने फिर मरने के लिए। निम्न वर्ग वाले लोग सरकारी अस्पताल में जाते हैं अपने मरीज को भर्ती करने के लिए पर यहां कोई व्यवस्था ही नही होती है, लोग मंत्रियों के बातों से प्रभावित होकर आजाते हैं इन पूरे राज्य का सबसे बड़े अस्पताल में भी उतना व्यवस्था नहीं होता है जितना एक प्राइवेट अस्पताल में, अगर राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में पच्चास बेड है आईसीयू में तब सौ बेड्स होते हैं एक अच्छे प्राइवेट अस्पताल में, अब आप खुद समझ सकते हैं स्तिथि को।
ऊंच क्लास वाले यहां नहीं दिख रहे हैं शायद वो बहुत सचेत रहते हैं अपने को लेकर, या फिर और ऊंचा अस्पताल में जाते हों।
जो भी हो इन अस्पतालों में भर्ती होते ही आधा जान तो खर्च के चिंता में ही निकल जाता है और मन मारकर रहते हैं और अपने मोबाइल से लोगों को कॉन्टैक्ट कर पैसों की व्यवस्था में लग जाते हैं। लेकिन पैसे ज्यादा अपने से ही करना होता है यहां तो भाई हमे एक यूनिट के लिए भी कोई तैयार नहीं हुआ,बराबर वाले, नीचे वाले,ऊपर वाले कोई नही, ये तो स्तिथि है।
बड़े अस्पतालों में अगर आपका मरीज रास्ते पर आगया तो आप रिलैक्स्ड हैं और नही तो  इंतजार कीजिए और बहुत गंभीर है तो अंत का इंतजार कीजिए। इंतजार जितना ही होगा हमारी आर्थिक स्तिथि उतना ही गिरेगा, कम या ज्यादा किसी न किसी तरह से तो हमे नुकसान होना ही है। अगर आप के पास बीमा है तब भी समय तो अच्छा खासा बरबाद होगा।और बीमा जब क्लेम करेंगें तो वहां भी कुछ हजार पैसा काट ही लेते हैं, एक तो भारी बीमा का प्रीमियम और फिर ऊपर से पैसा काट लेना  बहुत परेशानी की बात हो जाती है।
हमे तो सबसे ज्यादा परेशानी अपने बड़े भाई के वक्त हुआ था।
करीब बाइस दिन हम अस्पताल में रहे। ठंड का वक्त था है सुबह टंकी के पानी से ही नहा कर कुछ ध्यान योग कर हम टिफिन ले कर निकल जाते थे अस्पताल के लिए। कुछ दूर हम टेंपो से जाते और फिर पैदल ही गंतव्य की ओर  चल देते, उतना पैसा कहां से लाते, अपने शहर से दूर दूसरे राज्य के शहर में गए थे। ठंड पूरा था पूरा गर्म कपड़ा पहन कर मफलर लपेट कर पैदल चलते थे। अस्पताल में जाइए तो एक कोने में जाकर बैठ जाना है और रात वाले अटेंडेंट को टिफिन थमा देना है। टुकुर टुकुर दूसरों हॉल में बैठे बैठे देखते रहिए और ठंडक इतनी थी कि हॉल के एक कोने में भी गेट खुलते हवा शरीर ठिठुरा देता।
अस्पताल में जब भी माइक पर नाम किसी भी कॉल किया जाय तो ध्यान से सुनना पड़ता था और अगर हमारे पेशेंट का नाम पुकारा जाता तब तो जान ही निकल जाती थी। केस बहुत खराब था डेली दवाई तो कभी खून, तो कभी साइन करने तो कभी पैसा जमा करने को बुलाते थे, हमतो कंगाल ही थे फिर भी हमलोगों ने ईखत्ता कुछ सहयोग किया लेकिन ज्यादा तो उनके घर वाले ही किए। अस्पताल के रिसेप्शन हाल में नए नए दुखदाई आते और चले जाते पर हमारी व्यथा वैसा ही रहा। 
इतने लंबे समय के बाद भी सुधार नहीं था, पैसा भी उड़ रहा था फिर अंत में एक सुबह अनाउंस कर बता दिया गया, शायद उनका भी पाप का धन से मन भर गया तब थक हार कर सरेंडर कर दिए अस्पताल वालों ने। दस लाख के ऊपर खर्च हुआ था, पैसा गया, समय गया, और आदमी भी चले गया।
ऐसे तो दिन ही नही जिंदगी गुजरी है।
आज भी मुश्किलें जारी है, अभी भी अस्पताल में बैठे हैं जब पेशेंट आईसीयू में भर्ती है,खर्च सवा लाख से ऊपर हो चुका है,इसने अपना हेल्थ इंश्योरेंस भी नही कराया। बेटे को मजबूत करने के चक्कर में ये बरबाद हो गया।घर पर बैठ कर खाना है, बैंक से पैसा निकाल पॉकेट में रखकर सब को अपने हैसियत बताते रहना था, बाजार का सड़ा पचा खाना और घर पर एक्सपायरी पावरोटी खाते रहना का ये स्तिथि हुआ है।
अच्छे अस्पतालों की एक बहुत बड़ी अच्छाई है। अब इस अस्पताल में बैठे हैं,तीन चार या पांच कट्ठे में होगा ये अस्पताल पर इतने छोटे से जमीन पर कितने सौ स्टाफ काम करते हैं-गार्ड, दाई,नौकर,स्वीपर, लिफ्टमैन, रिसेप्शन,नर्स, डॉक्टर,दावा खाना, रसोई कैंटीन,एंबुलेंस, इत्यादि। कितने लोगों को का रोजी रोटी चलता है यहां से, यही अगर खाली जमीन होता तो सिर्फ दो तीन लोगों का मुश्किल से जीवन यापन चलता। तो जमीन से ज्यादा रोजगार और समृद्धि किसी बिल्डिंग से प्राप्त होता है।
आज मैं एक सरकारी (अर्ध) अस्पताल में आया हूं। यहां का दृश्य तो फोटो में देख सकते हैं। अंदर वार्ड में तो सब साफ सुथरा और ठंडा है, पर बाहर बैठक में व्यवस्था ठीक नही है, बहुत गर्मी है और पंखा का उच्च संख्या में नही है, बैठने का भी उतना जगह नहीं है। बाकी तो इलाज में नर्स और डॉक्टर तो दिख रहे हैं, पर प्राइवेट की तरह प्रॉम्टनेस तो नही ही है, यहां तक कि हमारे मरीज को सुना है की समय पर अटेंड नही करने के कारण वो गुजर गए। हल्का केसेस में तो यहां ला सकते हैं पर इमरजेंसी में एक्सपर्ट के पास ही जाना चाहिए।

Wednesday, 10 August 2022

Benefits of saliva (Lar)। लार के फायदे l Saliva on skin





मनुष्य का लार बहुत ही उपयोगी वस्तु है। सचाई तो ये है कि लार सभी जीवों का उपयोगी द्रव है। 

लार की सचाई


आपने देखा होगा कि सभी जानवर अपने बच्चों को जीभ से चाटती है। मनुष्य ऐसा नही करता है। अरे छोड़िए मनुष्य को ये बहुत कुछ नहीं करता है और बहुत कुछ करता है जो उसे नही चाहिए। हम अगर प्रकृति को देखें तो हम अन्य जीवों से बहुत अलग हो गए हैं, हम प्रकृति से ही बहुत अलग हो गए हैं, पर अन्य जीव  प्रकृति के साथ ही रहते हैं।

लार के फायदे

लार के फायदे के बारे में क्या बोला जाय, लार से तो हमारा पाचन क्रिया ही शुरू होता है। लार में वो एंजाइम इत्यादि होते हैं जो हमारे खाना खाते ही उस पर ये पचाने के काम शुरू कर देते हैं। ये क्रिया तो स्वाभाविक है जो अपने आप शुरू हो जाता है।
पाचन के अलावा लार के और भी फायदे होते हैं जिनका इस्तेमाल दूसरे जीव करते हैं पर हम नहीं। जैसे शुरू में ही बताया गया है जानवर अपने बच्चों को अपने जीभ से चाटकर स्वास्थ्य लाभ देता है। खास कर के कुत्तों के बारे में बोल जाता है कि वह जहां तक अपने शरीर को चाटता है वहाँ तक उसके चोट/घाव ठीक रहता है।
हम मनुष्य भी अगर अपना लार अपने चोटों और घाव पर लगाएं तो वह ठीक होने लगेगा। हम चेहरे के छाईं या आंखों पर लगाएं तो उसमे सुधार होने लगता है।

लार को सुबह सुबह लगाया जाता है। कुल्ला करने और पानी या कुछ भी पीने के पहले इस्तेमाल करना चाहिए।
लार वैसे उम्र के साथ स्वाभिक रूप से निकलता नहीं है सुबह में। जीभ पर से निकालने पर भी थोड़ा बुरा लगता है, तब हमें अपने होठों के अंदर से एक एक उंगली से निकाल कर अपने स्किन/चर्म पर उस नित्य लगाएं और निशुल्क फायदा देखें और प्राप्त करें कुछ दिनों में।  

लार के फायदे आंखों पर

 लार के फायदे आंखों पर भी देखा गया है। सुबह सुबह बासी मुंह बिना कुल्ला किये अगर हम अपने लार को अपने आंखों पर लगाएं तो आँखों सम्बंधित परेशानियां दूर होती हैं, जैसे आंखों में जलन या उसका लाल होना। इसी तरह आंखों की रोशनी भी सुधरते हुए देखा गया है।

भाई मुझे तो फायदा हुआ है, ये फायदा के पीछे मुझे तो लगता है यही कारण है। और लोगों को भी सुना है इससे फायदा हुआ है, आपलोग भी इसे आजमा लें, जाता क्या है और खर्च भी क्या है।