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Friday, 26 August 2022

अटेंडेंट की एक प्राइवेट अस्पताल में अनुभव । Selfie of an attendant in private hospitals l

ऊपर शिर्स्क वाले सेल्फी जो लिखा है उससे मेरा मतलब मोबाइल वाला सेल्फी नहीं पर ये सेल्फी फोटो से नहीं है पर ब्लॉग से अपना सेल्फी वर्णन है।
आज मैं Appolo Big Spectra अस्पताल में हूँ। पत्नी को डेंगू होगया है इसीलिए घर पर दिक्कत बढ़ जाने के कारण हमने सोचा कि अब अस्पताल में भर्ती कर दिया जाए। बगल यही अस्पताल था और मेरे सुभाव से मिलता हुआ यह अस्पताल था तो मैंने इसमें एडमिट कर दिया। पर कुछ देर बाद ही मुझे कॉल आया कि उपड आकर जानकारी दें। उपर आया तो देखा कि पत्नी के आंखों से धारा प्रवाह आंसू बह रहा है, मेरे पूछने पर कुछ बोल नही रही थी और और ज्यादा रोने लगती। बड़ा विकट स्तिथि था, अस्पताल वाले को पूछा तो वो भी कुछ नही बताया बस बोला कि शायद हड़बड़ा गयी है। मेरे कुछ जवाब देने पर ही बताई की ये सब देख कर डर लग रहा है। HDU मे भर्ती थी और चारों तरफ किस्म किस्म के मरीज पड़े हुए थे बड़ा भयावह दृश्य था, भाई मैं तो खुद ही डर गया था। याद आ गया मेरे बड़े भाई का अस्पताल का दृश्य।अस्पताल में जब भी कोई आता है और अगर उसका कंडीशन सीरियस हो और उस पर भर्ती होने पड़े तो सच में बड़ा डर लगने लगता है मरीज को और अटेंडेंट दोनों को, क्योंकि आजकल प्राइवेट अस्पताल बड़े बड़े बिल्डिंग तो हैं पर उनका सर्विस उतना बड़ा नहीं है। और अस्पतालों में, या ऐसे भी अन्य डॉक्टरों के यहां भी मरीज मरीज नहीं होता है पर एक ग्राहक के रूप में उसको देखा जाता है। मरीज को आजकल कस्टमर बोला जाता है जब अस्पताल वाले अपने सप्लायर से बातें करते हैं तब। मेन रोड पर इतने अस्पताल खुल गए हैं कि क्या करें बेचारे अस्पताल वाले।इसके बाद हर गली हर मुहल्ला में अस्पताल खुल गया है। आधे अस्पताल तो सामान्य लोग या व्यापारी खोल रहे हैं जिनका काम सिर्फ धनदा करना है मरीज का इलाज नहीं। तो प्रतिस्पर्धा इतना हो गया है और इन अस्पतालों पर इतना खर्चा है कि क्या करे बेचारा, एक एक मरीज के लिए तरसते हैं ये लोग। अगर एक मरीज चला गया हो इनके पास तो बस इन अस्पतालों के स्टाफ लग जाते हैं मरीज को फंसाने और फिर दुहने में। बेचारा मरीज और उसके परिजन परेशान रहते हैं इलाज करवाने में पर पहले तो अस्पताल के स्टाफ ही इनको अगर डॉक्टर न हो तो उलझने में लग जाते हैं और इलाज शुरू हुआ तो बेचारे मरीज को तरह तरह का चेकउप करवाना पड़ता है। पेट में दर्द हो तो CT स्कैन कार्रवाईएंगें सिर का। दवा में भी उसी तरह का मारा मारी करते हैं ये लोग। भर्ती हुए तो आसमान ही गिर पड़ता है बेचारे मरीज के परिवार को तो तबाह कर दिया जाता है।
मरीज का वर्ग अगर देखिएगा तो ये मध्यम वर्ग के ही होते हैं। इस वर्ग में निम्न मध्यम वर्ग, मध्यम मध्यम वर्ग, और उच्च मध्यम के ही होते हैं। निम्न वर्ग मतलब लोअर क्लास वाले तो कम से कम इतने बड़े अस्पताल में नहीं दिख रहे हैं, शायद इनके पास इतना होता ही नही है कि बेचारे प्राइवेट अस्पताल में आने का हिम्मत कर सके। इसी तरह अपर क्लास वाले पता नही पूरे तंदुरस्त रहते हैं क्या की वो दिख ही नही रहे हैं, हाँ एक्के दुक्के लड़कियां हाई फैशन लिबास और मेकअप में भले दिख जायें--नहीं ऐसा बात नहीं कुछ तो आते ही हैं शायद स्पेशल डॉक्टर को दिखाने आखिर बीमार तो कोई भी हो सकता है आप कितने भी फिट रहें एक्सीडेंट, मच्छर(डेंगू),और कैंसर जैसे परेशनयों तो किसी को भी अपने आगोश में ले सकती हैं। तो इन अस्पतालों में सिर्फ और सिर्फ मध्यम वर्ग, और ये प्राइवेट अस्पताल चलती भी हैं तो सिर्फ मध्यम वर्ग के मरीज पर, ये मध्यम वर्ग जो सरकारी अस्पताल जाते नहीं हैं और बहुत बड़े अस्पतालों या बड़े शहरों में औकात नही है जाने की।
अपने बारे में बताऊं। तो हमने घर पर निर्णय लिया की सुधार करने के लिए सिर्फ एक दिन अस्पताल में रह जाय, क्योंकि अगला दिन बच्चों को पढ़ाई के लिए दिल्ली जाना था और टिकट कटा हुआ था।अस्पताल में भर्ती होने का हिम्मत भी इसीलिए हुआ की हमारे दोस्त ने हमारा एक हेल्त इन्शुरन्स कर दिया था जबरदस्ती और हम भी बहुत लेहाजी दे दिए पैसा, अच्छा खासा अमाउंट था हमारे लिए भाई, अपनी ताकत से ज्यादा का, हमारी कमजोरी है हम नजदीकियों और इज़्ज़त देने वालों के सामने झुक जाते हैं और इसी प्रकरण में हमने ये अमाउंट अपने होम लोन एकाउंट से दे दिया इसमें हमारे इन्शुरन्स वाले दोस्त ने भी सहयोग किया था कुछ उधार हमारे तरफ से देकर। तो ये हेल्थ इन्शुरन्स अब काम आया और हमारा हिम्मत बढ़ाया गया। डॉक्टर भी खुश थे कि मरीज अपने तरफ से भर्ती हो रही हैं सो उन्होंने उसे HDU में भर्ती कर दिया। अब थोड़े देर बाद हमे फ़ोन आया कि अर्जेंटली मरीज को अटेंड करें। कमरे में गया तो वो एक कॉमन हॉल पाया जहां और भी मरीज थे विभिन्न स्थितियों में और पत्नी रो रही थी।हम हतप्रभ ये क्या हुआ इतना स्ट्रांग और दुनिया को सहारा देने वाली खुद रो रही थी, हमारे पूछने पर भी कुछ नही बोल रही थी, हमने वार्ड अटेंडेंट को पूछा तो वो भी कुछ नही बताने में असमर्थ था, बड़ा समस्या। हम तो घबरा गए,पत्नी को पूछा कि कोई कुछ किया क्या तो उसने न में बताया तत्काल शांति मिली फिर पूछा तो क्या हुआ तो बताई ये दिन और ऐसा दृश्य का हमने नहीं सोचा था। सच बात तो यही था कि हम सब तो एक प्राइवेट रूम का सोचा था और ये कहाँ आ गए। फिर क्या करते , हमने इमरजेंसी,जहां से रेफेर किया गया था वहां पूछा तो उन्होंने ने कुछ कुछ हमे समझा दिया। लौटकर हम अपने बेटी और पत्नी की भतीजी के साथ हर कर अस्पताल के कैंटीन में बैठ गए कुछ खाने के लिए क्योंकि सुबह से हमने कुछ खाया नहीं था। अपना खाना थाली वाला लिया और टेबल पर बैठ गया फिर हमने अपने बेटी को बताया कि भाई को भी बुला ले खाने के लिए जिसे मैंने कुछ समय पहले डांट कर भगा दिया था। बहन के फ़ोन पर तुरंत आ गया और तब तक मैं कह चुका था।अब चर्चा हुई इनके माँ के बारे में और मैंने बताया की ये ज्यादा पैसे लेने के लिए दूसरे जगह रख दिये हैं। इस पर लड़की बोली कि हम बोलें जा कर क्या तो मैंने बोल दिया ठीक है और सब काउंटर बताया जहाँ बात करना पड़ेगा। फिर ये दोनों बच्चे, 18 और 20 साल के हैं, दौर धूप कर रूम अलॉट कर ही लिया बस हमसे इन्होंने पूछा कि कितने अमाउंट क लिया जाए तो मैंने उचित डिसिशन के लिए उन्हें बता दिया, उन्होंने ने इन्शुरन्स अमाउंट जब पूछा तब मेरे बताने पर खाफी रिलैक्स दिखे ये ।इतनी आजादी मिलते ही इनलोगों ने रूम फाइनली बुक कर दिया, और हाँ इसके पीछे मुझे अपने इन्शुरन्स वाले दोस्त से मार्गदर्शन भी मिला था क्योंकि आजतक मैं ऐसी कोई हेल्थ इन्शुरन्स का सुविधा नहीं उठाया था।
खैर बच्चे अब बहुत खुश थे अपने इच्छा हासिल करने पर। फिर इन्होंने मुझे प्राइवेट रूम में फ़ोन कर बुलाया और अंदर जाते देखा कि सभी बहुत खुश थे और तीनों गप शप में लगे हैं। 
सब कुछ ठीक था और माहौल पिकनिक का था पर कुछ देर बाद मरीज का स्थिति बिगड़ने लगा जो रात होते होते ज्यादा ही बिगड़ गया।आज पता चला कि प्लेटलेट संख्या कल से भी कम हो गया , मरीज के साथ तो अब हम भी परेशान हो गए और इसी परेशानी में स्तिथि नाज़ुक देखते हुए हमने बच्चों का दिल्ली का टिकट ही कैंसल कर दिया। तो यही हुआ पिकनिक अब परेशानी में बदल गया।
आज रविवार है, सुबह में कैम्प लगा था तो कुछ चल पहल भी था पर शाम होते ही सब बदल गया अब तो माहौल मनहूस जैसा हो गया है, एक दम शांत हो गया है पूरा फ्लोर रूम के बाहर कोई आवाज और कोई भी चहल पहल नही । ठंडा ठंडा रूम और बाहर बादल ने पूरा वातावरण बदल दिया है अब तो जो पहले वाला पिकनिक मूड था अब उलट गया है इन सबके ऊपर फलाहारी मनाने के कारण और भी पनिशिंग हो गया है।
मरीज में सुधार होने के कारण अब लौट ही चलें। बच्चों का भी टिकट तेजस से कर दिया है और भी कल शाम को निकल जाएंगे। फिर यहाँ अब कोई आएगा भी नहीं, जो नजदीकी आने वाले थे वो सुधार देख कर अपनी ये कंपल्सरी विजिट को यही बहाने टाल दिया।
आज डॉक्टर साहब ने फाइनली रेलीज़ करने को कह दिया है, अब पेपर बन रहा है, हम सब सामान पैक कर बैठे हैं रूम, जो छटे तल्ला पर है खिड़की के पर्दा उपड कर बैठे हैं। वो रूम जो पहले दिन इतना अच्छा लगा था बाद में मनहूस लगने लगा, आज भी वही हाल है, सब फैसिलिटी होने पर भी कुछ अच्छा सा नही लग रहा है, जबकि दूसरे रूम में लगता है लोग आराम से हैं और बाहर आम जगह फिर चहल पहल और लोगों के बीच ठीक से लगता है।
आज,बहुत दिनों के बाद एक दूसरे अस्पताल में बैठा हूं। ठंडी का मौसम है और इस मौसम में बीमारी काम होता है तो मरीज भी कम होते हैं, हमने यही सोच कर समझा की अस्पताल में पेशेंट कम होंगें पर आप ऊपर फोटो में जैसा देख सकते हैं की अस्पताल भरा हुआ है और इसमें मरीज की कमी नहीं है।
तब अपना अपना भाग्य है, इससे भी ज्यादा अपना अपना मेहनत और सर्विस है। इस अस्पताल के साथ उसका इस प्रांत में उसका लोकेशन भी है। ये अस्पताल ऐसा जगह पर स्थित है की यहां राज्य के आधा आबादी के रास्ते में पड़ता है।
अब रह गया मरीजों का बात तो कुछ लोग अंदर आ रहे हैं तो कुछ बाहर जा रहे हैं, अपना अपना सामान के साथ।
ज्यादातर लोग तो सामान्य से गंभीर ही है।
भाई ये अलार्म क्यों बार बार बज रहा है, अगर आग लगा तो हमारा मरीज तो चल भी नहीं सकता है इतना कमजोर है। ऐसे ही स्थिति में लाचार मरीज किसी अनहोनी दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं।
खैर मैं अस्पताल में अटेंडेंट सभी का विवरण दे रहा था, कुछ को मैंने सुसकते हुए देखा तब आगे बड़ा तो किसी के आंख लाल था। एक मेरे पीछे बैठी है शायद उमर वाली किसी को देर से मोबाइल पर समझा रही हैं।
छोटा रिसेप्शन और भीड़ ज्यादा होने के कारण आवाज कोलाहल ज्यादा है चारों तरफ।
कभी रिसेप्शन हाल में बैठ कर समय गुजारते हैं और बहुत समय हो जाता है तब सोचते हैं अब रूम में भी बैठना चाहिए तब वहां अंदर जा कर बैठते हैं।
और जब अंदर बैठे बैठे मन ऊब जाता है तब फिर बाहर निकल कर कॉरिडोर में घूमते हैं, यहां अगर कोई मोबाइल पर बात करता हो तो उसके पीछे हो कर उसकी बातें सुन टाइम गुजारते हैं। यही रूटीन होता है अस्पताल के अंदर। वैसे ज्यादा समय तो मोबाइल पर ही गुजरता है।

विजिटर्स को परेशानी बहुत है। एक दो से ज्यादा विजिटर या अटेंडेंट  नही रहने देते रूम में। आईसीयू में अगर आप जाना चाहें तो ये आप से पास मंगेगें या लिफ्ट पर ही रोक देते हैं, कुछ गार्ड तो आग्रह करेंगें पर कुछ तो सीधा ही मना कर देते हैं और आप कुछ नही कर सकते हैं, बस आपको वापस आकर अपने लिए जगह ढूंढ कर बैठ जाना होगा भरी मन से।
आप अगर कैश में इलाज करवा रहे हैं तो दवा,इलाज अन्य खर्चों से आप पस्त हो जायेंगें। इसीलिए हो सके तो किसी कंपनी से अपना स्वास्थ्य बीमा करा लें और निश्चिंत होकर अपना इलाज करवाएं।
जानलें बीमा होने पर भी ये कंपनियां कुछ पैसा काट लेते हैं, मतलब पुरा पैसा इलाज का वापस नहीं करते हैं।
अस्पताल में  भी आपको सचेत रहना होगा और उनका कागज बिल देखते रहना होगा नही तो  बिना वजह ये एक ही दावा का खर्च दोहरा देते हैं। इसी तरह ये अन्य खर्च जैसे जांच इत्यादि में भी ऐसा घोटाला होते रहता है।

अब हमे अचानक आईसीयू में आजाना पड़ा। रात में खून की उल्टियां हुईं और मरीज को जल्दी जल्दी आईसीयू में ऑक्सीजन के साथ शिफ्ट कर दिया गया।
हम सुबह पहुंचे तब मुझे आईसीयू के वेटिंग रूम में बैठना हुआ, यहां तो पहले से ही अटेंडेंट सब अपने अपने मरीज और पैसों की मार से गंभीर और गमगीन चेहरों में थे। यहां जहां जगह है बैठ जाएं कोई टोक टॉक नही सभी तो अपने ही परेशानी के बोझ तले झुके हुए हैं, सर उठता कहां है बेचारों का। जितने अटेंड्ट को देख रहा हूं सभी मध्यम वर्ग से हैं।इसका मतलब मरीज मध्यम वर्ग से ही आते हैं। बेचारे मिडिल क्लास, जीना मुश्किल है। अगर मरीज मिडिल क्लास से हैं तो मतलब ये होता है की गलती इनका ही है, ये लोग अपने खान पान और स्वास्थ पर ध्यान नहीं देते हैं।
लोअर क्लास के लोग तो ऐसे महगें प्राइवेट अस्पताल में हिम्मत नही कर सकते आने का, इन्हे तो सरकारी अस्पताल में ही जाना पड़ता है जहां उन्हें सरकार और उनके नुमाइंदों के भरोसे रहना पड़ता है, वही सरकार जो इन्हें 90 पर्सेंट हिस्सेदारी का वायदे देकर इन लोगों को अस्पताल के फर्श पर छोड़ देते हैं सड़ने फिर मरने के लिए। निम्न वर्ग वाले लोग सरकारी अस्पताल में जाते हैं अपने मरीज को भर्ती करने के लिए पर यहां कोई व्यवस्था ही नही होती है, लोग मंत्रियों के बातों से प्रभावित होकर आजाते हैं इन पूरे राज्य का सबसे बड़े अस्पताल में भी उतना व्यवस्था नहीं होता है जितना एक प्राइवेट अस्पताल में, अगर राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में पच्चास बेड है आईसीयू में तब सौ बेड्स होते हैं एक अच्छे प्राइवेट अस्पताल में, अब आप खुद समझ सकते हैं स्तिथि को।
ऊंच क्लास वाले यहां नहीं दिख रहे हैं शायद वो बहुत सचेत रहते हैं अपने को लेकर, या फिर और ऊंचा अस्पताल में जाते हों।
जो भी हो इन अस्पतालों में भर्ती होते ही आधा जान तो खर्च के चिंता में ही निकल जाता है और मन मारकर रहते हैं और अपने मोबाइल से लोगों को कॉन्टैक्ट कर पैसों की व्यवस्था में लग जाते हैं। लेकिन पैसे ज्यादा अपने से ही करना होता है यहां तो भाई हमे एक यूनिट के लिए भी कोई तैयार नहीं हुआ,बराबर वाले, नीचे वाले,ऊपर वाले कोई नही, ये तो स्तिथि है।
बड़े अस्पतालों में अगर आपका मरीज रास्ते पर आगया तो आप रिलैक्स्ड हैं और नही तो  इंतजार कीजिए और बहुत गंभीर है तो अंत का इंतजार कीजिए। इंतजार जितना ही होगा हमारी आर्थिक स्तिथि उतना ही गिरेगा, कम या ज्यादा किसी न किसी तरह से तो हमे नुकसान होना ही है। अगर आप के पास बीमा है तब भी समय तो अच्छा खासा बरबाद होगा।और बीमा जब क्लेम करेंगें तो वहां भी कुछ हजार पैसा काट ही लेते हैं, एक तो भारी बीमा का प्रीमियम और फिर ऊपर से पैसा काट लेना  बहुत परेशानी की बात हो जाती है।
हमे तो सबसे ज्यादा परेशानी अपने बड़े भाई के वक्त हुआ था।
करीब बाइस दिन हम अस्पताल में रहे। ठंड का वक्त था है सुबह टंकी के पानी से ही नहा कर कुछ ध्यान योग कर हम टिफिन ले कर निकल जाते थे अस्पताल के लिए। कुछ दूर हम टेंपो से जाते और फिर पैदल ही गंतव्य की ओर  चल देते, उतना पैसा कहां से लाते, अपने शहर से दूर दूसरे राज्य के शहर में गए थे। ठंड पूरा था पूरा गर्म कपड़ा पहन कर मफलर लपेट कर पैदल चलते थे। अस्पताल में जाइए तो एक कोने में जाकर बैठ जाना है और रात वाले अटेंडेंट को टिफिन थमा देना है। टुकुर टुकुर दूसरों हॉल में बैठे बैठे देखते रहिए और ठंडक इतनी थी कि हॉल के एक कोने में भी गेट खुलते हवा शरीर ठिठुरा देता।
अस्पताल में जब भी माइक पर नाम किसी भी कॉल किया जाय तो ध्यान से सुनना पड़ता था और अगर हमारे पेशेंट का नाम पुकारा जाता तब तो जान ही निकल जाती थी। केस बहुत खराब था डेली दवाई तो कभी खून, तो कभी साइन करने तो कभी पैसा जमा करने को बुलाते थे, हमतो कंगाल ही थे फिर भी हमलोगों ने ईखत्ता कुछ सहयोग किया लेकिन ज्यादा तो उनके घर वाले ही किए। अस्पताल के रिसेप्शन हाल में नए नए दुखदाई आते और चले जाते पर हमारी व्यथा वैसा ही रहा। 
इतने लंबे समय के बाद भी सुधार नहीं था, पैसा भी उड़ रहा था फिर अंत में एक सुबह अनाउंस कर बता दिया गया, शायद उनका भी पाप का धन से मन भर गया तब थक हार कर सरेंडर कर दिए अस्पताल वालों ने। दस लाख के ऊपर खर्च हुआ था, पैसा गया, समय गया, और आदमी भी चले गया।
ऐसे तो दिन ही नही जिंदगी गुजरी है।
आज भी मुश्किलें जारी है, अभी भी अस्पताल में बैठे हैं जब पेशेंट आईसीयू में भर्ती है,खर्च सवा लाख से ऊपर हो चुका है,इसने अपना हेल्थ इंश्योरेंस भी नही कराया। बेटे को मजबूत करने के चक्कर में ये बरबाद हो गया।घर पर बैठ कर खाना है, बैंक से पैसा निकाल पॉकेट में रखकर सब को अपने हैसियत बताते रहना था, बाजार का सड़ा पचा खाना और घर पर एक्सपायरी पावरोटी खाते रहना का ये स्तिथि हुआ है।
अच्छे अस्पतालों की एक बहुत बड़ी अच्छाई है। अब इस अस्पताल में बैठे हैं,तीन चार या पांच कट्ठे में होगा ये अस्पताल पर इतने छोटे से जमीन पर कितने सौ स्टाफ काम करते हैं-गार्ड, दाई,नौकर,स्वीपर, लिफ्टमैन, रिसेप्शन,नर्स, डॉक्टर,दावा खाना, रसोई कैंटीन,एंबुलेंस, इत्यादि। कितने लोगों को का रोजी रोटी चलता है यहां से, यही अगर खाली जमीन होता तो सिर्फ दो तीन लोगों का मुश्किल से जीवन यापन चलता। तो जमीन से ज्यादा रोजगार और समृद्धि किसी बिल्डिंग से प्राप्त होता है।
आज मैं एक सरकारी (अर्ध) अस्पताल में आया हूं। यहां का दृश्य तो फोटो में देख सकते हैं। अंदर वार्ड में तो सब साफ सुथरा और ठंडा है, पर बाहर बैठक में व्यवस्था ठीक नही है, बहुत गर्मी है और पंखा का उच्च संख्या में नही है, बैठने का भी उतना जगह नहीं है। बाकी तो इलाज में नर्स और डॉक्टर तो दिख रहे हैं, पर प्राइवेट की तरह प्रॉम्टनेस तो नही ही है, यहां तक कि हमारे मरीज को सुना है की समय पर अटेंड नही करने के कारण वो गुजर गए। हल्का केसेस में तो यहां ला सकते हैं पर इमरजेंसी में एक्सपर्ट के पास ही जाना चाहिए।