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Saturday, 10 September 2022

Corrrupt Traffic Police system l ट्रैफिक एक सरकारी वसूली उद्योग







 भाई ट्रैफिक पुलिस वाले तो गजब मनमानी करते हैं।

रोकेंगें आपको, गाड़ी नम्बर का फोटो खिंचेगें पर उनसब को छोड़ आपसे बेल्ट या लाइसेंस के बारे में बात करने लगेंगें। मतलब समझें, आपके गाड़ी का नम्बर अपने मोबाइल में डाल कर सब

उनको तो बस किसी भी तरह से आपसे पैसे खींचना है।

हम तो समझते हैं कि अगर आपका गाड़ी रोकते ही आप अपने खिड़की से पैसे बढादें तो शायद निपटारा वहीं हो जाये,और सब कागज पत्र के झंझट छोड़ आगे बढ़ सकते हैं जैसे ट्रक वालों के साथ इनका डीलिंग होता है।

ट्रक वाले खिड़की से फिक्स पैसा अपने हाथ में रखते हैं जिससे पुलिस वाले को चलती गाड़ी से बाहर कर दे चलते बनते हैं।

एक बार एक पुलिस वाला मेरी प्राइवेट गाड़ी चेक करते करते अंत में मुझसे निजी वाहन का फिटनेस सर्टिफिकेट मांगने लगा था। इनको तो बस किसी भी तरह पैसा चाहिए, भाई सभी जगह पहुंचाना जो होता है।

ट्रैफिक एक वसूली उद्योग

ट्रैफिक व्यवस्था एक वसूली उद्योग है जिसमे सरकार और पुलिस मिल कर चलाते हैं, मतलब सब के लिए ये उद्योग खुला या उपलब्ध नही है सिर्फ और  सिर्फ  सरकारी लोग ही इसे चला सकते हैं। इससे बढ़िया और कोई उद्योग ही नही है, इसमें कोई इन्वेस्टमेंट नही है सिर्फ कमाई ही कमाई है। कोई रिस्क नही सिर्फ जनता को मिल्क करना है।

ये करोड़ों का व्यवसाय है और पूरा विभाग इससे मालामाल होते हैं।

भाई अंधेर नगरी चौपट राजा वाला खिस्सा है यहाँ, शायद यहीं नही सारे सरकारी व्यववस्था में ही क्योंकि इन कठपुतलियों का डोर तो इनके आका के हाथ में होती है जो अपने अपने ऑफिसों से चलाते रहते हैं।

इन सब का मनसा सिर्फ एक होता है पब्लिक को दुहना। आम जनता को लूटना और अपना अपना जेब नही परंतु घर नोटों से बढ़ना।

जानते हैं, ये राह चलते लोगों को परेशान करते हैं। क्या रिक्शा वाला क्या चार पहिया वाला।

ये लीचर लोग रिक्शा वाले या रिक्शा पर चलने वाले लोगों को भी नहीं बख्शते हैं। अगर आप रिक्शा से भी जा रहे हैं तो कुछ न कुछ बहाना लगाकर पैसे खिंचने का कोशिश करते हैं। जैसे अगर रिक्शा से कुछ सामान ले जा रहे हैं तो तब भी ये लोग आपको रुकवा का परेशान करेंगें, पूछेंगे की आप सामान को रिक्शा से क्यों ले जा रहे हैं। और दो पहिया और चार पहिया का कहानी त अनेखः है। 

सोचिए ये सब घनी आबादी में होता है जहां ट्रैफिक 10 या 20 किलोमीटर प्रति घण्टा चलता है, कभी इतना कम स्पीड में एक्सीडेंट हो सकता है क्या। गाड़ियां तो हाई स्पीड में हाईवे पर चलती है जहां रोड पर कोई ट्रैफिक नही होता है। यहां दो पहिये भी 70/80 किलोमीटर प्रति घण्टे के हिसाब से भागती है। दुर्घटनाएं यहां होती हैं, रोज गाड़ी वाले या आम पब्लिक ऐसे धक्कों से मेरी जाती है, पर इन सड़कों और पुलिस बहाल नही होगी क्योंकि यहां गाड़ियों को रोकना और कमाना मुश्किल है।

भाई इस धन्दे में सब लिप्त हैं खुलम खुल्ला वसूली होता है सब जानते हैं मगर न जनता आवाज़ उठाती है न ये भर्ष्ट और बेशर्म सरकार और उनके वसूली एजेंट विभाग वाले वर्दी वाले।

भाई ये खिस्सा तो सरकार के हर विभाग में है, सब मोटे मोटे वेतन लेते हैं और उससे भी मोटे पब्लिक से घुस और विकास के फण्ड पर पूरा हाथ साफ किया जाता है।

जान लीजिए जहां जितना बेकारी और पिछड़ापन है वहाँ उतना ही भरस्टाचार है।

ट्रैफिक पुलिस कैसे मैनेज होते हैं

लोगों को देखकर या उनका अनुभ लेकर आप ट्रैफिक पुलिस मैनेज होते हैं।

जैसे ट्रक वालों से सीखें, हाथ में पैसा रखते हैं और खड़ा सिपाही को दे चलते बनते हैं।

मैनेज करने वाले को अगर किसी ने रोका तो घबराते नहीं, कुछ गिड़गिड़ा कर या कुछ रिक्वेस्ट कर अमाउंट पैसे का सेटल कर लेते हैं।

ये अगर नहीं माने तो थोड़ा इंतेज़ार करते हैं और थोड़ा खींचते हैं उनको।

हाँ अपने सौदेबाज़ी में ईमानदारी रखते हैं या ऐसा शो करते हैं कि आप सही हैं अपने बातों में।

आप थोड़ा जेनुइन रहेंगें अपने वेशभुसा में तो थोड़ा राहत मिल सकती है उनके बोली और डिमांड में, आखिर पहला इम्प्रैशन बड़ा इम्प्रैशन होता है।

और सबसे बढ़िया तो होगा कि आप अपना सभी कागज़ ही सही रख्हें और गलत पर उन पर चढ़ जाएं।