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Monday, 20 February 2023

Helpless Mother। असहाय मां





यही वो चबूतरा है जहां मां पाईं गई थी।
हमारी मां जमींदार घर की मगर अपने पिताजी के गुजरने के कारण अपने ननिहाल में पली बढ़ी। मां के ननिहाल में उनके नाना दरोगा थे जो कभी हमारे गांव में पोस्टेड हुए थे जिसके कारण उनका रिश्ता यहीं हुआ था, पर मां अपने अन्य नाना के भाइयों के साथ रहती थीं जो जज थे, इसी तरह एक अन्य भाई कलेक्टर हुआ करते थे, पर इनका रहना सदैव अपने जज नाना के साथ ही हुई, और जहां भी इनका ट्रांसफर हुआ मां वहीं साथ जाति थी।
हमारी नानी अपनी नैहर में ही रहती थी, वो जादतर गांव पर रहती थी और वहां का खेत अनाज का देख रेख में अपना दिन बिताती थीं।
बड़ा सा घर हमारे पिताजी ने रिटायर होने के बाद बनाया था, जिसे उन्होंने मां का ही नाम दिया था,राजकिशोर भवन, इस डर से की कहीं कोई बेटा मां के साथ कोई गलत न करे जैसा अभी जमाने में चल रहा था और है भी।
वैसे पिताजी से ज्यादा तो हम दो भाई ही ज्यादा मानते थे अपने मां को, उसमे भी मेरा मां से लगाव एक बड़ा उदाहरण ही रहा है।
हम चार भाई थे, कुछ दूसरे राज्य में रहते थे और हम दो यहां ही। सबसे छोटा गांव पर मां पिताजी के साथ रहता था और मैं अपने परिवार के साथ राजधानी में अपना बिजनेस चलाता था। थोड़ा तेज़ होने के कारण कोई भी घर का परेशानी जैसे इलाज़ का मुझे ही देखना पड़ता था, कार होने के कारण मां पिताजी को गांव से शहर और फिर इलाज कर वापस करना हमारा ही काम होता था। इस सेवा में हम दोनो अपने अपने फील्ड में एकदम निपुण थे और बड़े शौक से हम उनका आगमन और घर पर रखना एंजॉय करते थे, इसमें मुख्य वजह मां से लगाव होने के कारण उनसे मजाक और पत्नी का शिकायत करना और सुनना होता था।
इसी तरह हमलेगों का जिंदगी बीत रहा था, पैरेंट्स के साथ रहना और उनका अस्पताल में इलाज कराना, क्योंकि हम उन्हे ठीक कर गांव भेजते थे पर घर पर उनका सेवा और खानपान ठीक से नहीं होता था, इसी तरह गांव से अस्पताल ,अस्पताल से गांव और फिर एक बार गांव से अस्पताल होते होते पिताजी का स्तिथि बिगड़ते चले गया और फिर आईसीयू फिर उसके बाद वेंटीलेटर पर जाने के बाद वो दुनिया छोड़ गए। घर पर एक बड़ा वट वृक्ष गिरने से हम सब बहुत दुखी थे और ज्यादा मैं अपने ज्यादा इमोशनल स्वभाव होने के कारण।
अस्पताल फिर गांव पर पिताजी का  काम सब अपने पैसों से कहीं से भी कोई हेल्प नही मिला, घर पर तो हमे यही पता था कि यहां तो को पैसा भी होगा क्योंकि जिस तरह से सब गुम्मी मारे हुए थे उससे कुछ इसी तरह ही हमने समझा। पर घर वालों की बेवकूफी के कारण जो इलाज का पैसा हमे कंपनी से वापस मिलता वो भी सारा डूब गया।
सारा काम क्रिया करने के बाद और घर पर तमाशा होने के बाद हम सब भारी मन से अपने शहर लौट गए।
गांव पर रिश्ता ही ठंडा होगया था जिसके कारण हमलोगो का वहां जाना बंद हो गया था। फिर पता नही किस बात पर हम एक दिन गांव गए। यहां हमने कुछ बैंक के अकाउंट बुक्स देखे जिन्हें ध्यान से देखने पर सारा माजरा समझ में आया। हमने सभी बैंक का काम ठीक कर दिया, बचत खाते के ज्यादा पैसों को फिक्स करा दिया फिर वापस आ गए।
हम ठंडा हो चुके थे और अपने स्वभाव के कारण फिर से घर पर रिश्ता ठीक कर लिया।
अब फिर से एकबार घर आना जाना शुरू हो गया, समय और मौकों पर हम शौक से अपने कार से गांव आ जाते, मां से जो लगाव था, और अब फिर से उनका तबियत खराब होने पर उन्हें शहर लाना होता था। सब कुछ भुला चुके थे और हम फिर से इस संबंध को एंजॉय करने लगे थे।
इसी तरह समय खुशी खुशी गुजरते गया और एक दिन ठंडा के मौसम में सुबह सुबह फोन आया की सबसे बड़ा भाई को स्ट्रोक हो गया है और आईसीयू में भर्ती है, हम सब तुरंत अपने बच्चों और मां को छोड़ ट्रेन पकड़ कानपुर के लिए रवाना हो गए। अब यहां रात दिन अस्पताल में बैठे समय और पैसा गुजर रहा था जब पच्चीस दिन बाद दसों लाख खर्चा कर अस्पताल वालों का जब मन भर गया तब जवाब दे दिया।हम उनका अंतिम वहीं कर अपने घर आगए।
मां पर कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ा था, अगर कोई अपना आता था फॉर्मेलिटी में तभी वो रोती थीं।