Thursday, 23 June 2022

Rasaynik Khad ya Jaivik khad

 आज रासायनिक खाद और जैविक खाद पर बहुत विवाद उठ गया है हमारे देश में। वैसे अगर हम दूसरे देशों में झांके तो मेरे समझ से कम से कम सभी विकासशील, मतलब गरीब देशों में एक ही स्तिथि है।

Rasaynik khad ki jarurat। रासायनिक खाद की जरूरत

जब से मानव सभ्यता खड़ा हुआ तबसे खेती उस वक्त के उपस्तित वस्तुओं से कम चलाया गया। खाद के नाम पर लोग जंगल को ही जल देते थे और फिर उस जगह पर खेती करते थे। इसके बाद किसान सड़ा हुआ मल गोबर का इस्तेमाल करने लगे। इसी तरह से खेती और जिंदगी चल रही थी हज़ारों साल से। लेकिन इतने सालों में पर्यावरण को कोई छति तो कभी हुई नहीं, क्योंकि न तो कारखानों का कार्बोनिक उत्सर्जन हुआ न ही आबादी बड़ी। लेकिन अकाल बार बार होते रहा, इसका एक कारण तो साशन की बहुत ज्यादा और जबरदस्ती वसूली किसानों से राज्य के नाम पर। लेकिन बाढ़ और सुखाड़ से पैदावार कम होने से अकाल जरूर पड़ता था। फिर धीरे धीरे आबादी भी बढ़ने लगी,तब ज्यादा अनाज की जरूरत पड़ने लगी। और फिर रासायनिक खाद का ईजाद हुआ जिसके इस्तेमाल से किसान ज्यादा फसल उपजाने लगे।

रासायनिक खाद के इस्तेमाल से दुनिया से अकाल और भुखमरी दूर हो गयी।

किसान हर फसल और खेती में रासायनिक खाद का इस्तेमाल करने लगे। किसान ज्यादा और ज्यादा उपज के लिए अनाधुन इस खाद का इस्तेमाल करने लगे।

Rasaynik khad ka dushparinam ।रासायनिक खाद का दुष्परिणाम

रासायनिक खाद से समृद्धि तो आयी, भुखमरी भी दूर हुआ, पर हिसाब से ज्यादा इस्तेमाल से इसका दुष्परिणाम भी दिखने लगा।

सबसे पहले तो अत्यधिक रासायनिक खाद के इस्तेमाल से लोगों के स्वास्थ पर पड़ा। लोग के सेहत में विभिन्न रोग होने लगा।

दूसरा और सबसे ज्यादा तो रासायनिक खाद मिट्टी की उर्वरकता खत्म होने लगी। रासायनिक खाद का इस्तेमाल हर साल खेत में बढ़ने लगी, ये ऐसा कुचक्कर चला कि हर नई फसल चक्र में खेतों में और ज्यादा खाद देना पड़ रहा था। मिट्टी की उर्वरकता हर बार रासायनिक खाद के इस्तेमाल और घटते जा रही थी। ये एक चक्र ऐसा बन गया कि खेत में पिछले समय से और ज्यादा खाद देना पड़ रहा था, और इसके देने के बाद मिट्टी और ज्यादा ऊसर हो रही थी, जो अब अगले फसल में और ज्यादा रसायनिक खाद का जरूरत मांगता था।

इस चक्कर में खेत, किसान, और सरकार सभी फंस गये हैं। रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करते हैं तो उपज कम होती है, उपज कम होती है तो आमदनी किसानों की कम होती है और फसल उपज के दाम आसमान छूने लगतीहै। देश में महंगाई बढ़ जाती है और किसान के साथ साथ जनता हाहाकार मचा देती है। जन प्रतिनिधि वाली सरकार पेशोपेश में आजाती है इसे समझ में नही आता है कि क्या करें क्या न करें, खाद कम या बंद करे तो किसान हल्ला करती है, महंगाई से आम जनता भी हंगामा करती है। कृत्रिम खाद न बन्द करे तो खेत तो बर्बाद होती ही है और साथ में विदेश से यह खाद खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा यानी डॉलर की व्यवस्था साथ में करनी पड़ती है, जो कि बहुत मुश्किल काम होता है।

Rasayanik khad ka vikalp। रासायनिक खाद के चक्र से मुक्ति

अब इस कुचक्र से कैसे मुक्ति मिले यह भारत ही नही सभी विकासशील देशों की समस्या हो गयी है। इस चक्र को रोकना मुश्किल हो गया है, रोकते हैं तो मुश्किल नही रोकते हैं तो मुश्किल।

यदि एकाएक इस चक्र को रोकने से देश की स्तिथि श्रीलंका की तरह धड़ाम से नीचे गिर जाएगी, और यहां का हाल भी जीवन मृत्यु वाला हो जाएगा।

इसका एक ही उपाय है कि हम मिश्रित व्यवस्था बनाएं, जहाँ कृत्रिम खाद और जैविक खाद दोनों का इस्तेमाल हो। धीरे धीरे हमें जैविक खाद की मात्रा को बढ़ाना होगा तभी जा कर ये एक तरफ व्यवस्था, जहाँ सभी इसमें नुकसान में हैं, ठीक हो सकेगा नही तो श्रीलंका की तरहअचानक से रासायनिक खाद बन्द करने से उन्ही की तरह हमारा खेती प्रधान व्यस्तस्था और भी भयावह हो जाएगा।

आज क़तर देश से पानी जहाज में कंटेनर द्वारा गाय की गोबर का डिमांड है तब हम अपने यहाँ क्यों न इस्तमाल करें। हमे देखना होगा कि हम सही और मजबूत जैविक खाद का इस्तेमाल करें। जैविक खाद ही हमारे देश की अनेक परेशानियों से बचाएगा, विदेशी मुद्रा, स्वास्थ, खेत इत्यादि को। देश का भविष्य जैविक खाद से जुड़ा है। जैविक खाद है तो हम रहेंगें, नही तो सब खत्म होजायेगा, श्रीलंका से भी भयावह हमारा अंजाम होगा, त्राहि त्राहि मचेगा और दाने दाने को देश तड़पेगी।

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